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Saturday, 27 July 2013

अध्याय 4 श्लोक 4 - 21 , BG 4 - 21 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 21

ऐसा ज्ञानी पुरुष पूर्णरूप से संयमित मन तथा बुद्धि से कार्य करता है, अपनी सम्पत्ति के सारे स्वामित्व को त्याग देता है और केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करता है | इस तरह कार्य करता हुआ वह पाप रूपी फलों से प्रभावित नहीं होता है |


Monday, 22 July 2013

अध्याय 4 श्लोक 4 - 20 , BG 4 - 20 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 20

अपने कर्मफलों की सारी आसक्ति को त्याग कर सदैव संतुष्ट तथा स्वतन्त्र रहकर वह सभी प्रकार के कार्यों में व्यस्त रहकर भी कोई सकाम कर्म नहीं करता |



अध्याय 4 श्लोक 4 - 19 , BG 4 - 19 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 19

जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास (उद्यम) इन्द्रियतृप्ति की कामना से रहित होता है, उसे पूर्णज्ञानी समझा जाता है | उसे ही साधु पुरुष ऐसा कर्ता कहते हैं, जिसने पूर्णज्ञान की अग्नि से कर्मफलों को भस्मसात् कर दिया है |


अध्याय 4 श्लोक 4 - 18 , BG 4 - 18 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 18

जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह सभी मनुष्यों में बुद्धिमान् है और सब प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त रहकर भी दिव्य स्थिति में रहता है |


अध्याय 4 श्लोक 4 - 17 , BG 4 - 17 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 17


कर्म की बारीकियों को समझना अत्यन्त कठिन है | अतः मनुष्य को चाहिए कि वह यह ठीक से जाने कि कर्म क्या है, विकर्म क्या है और अकर्म क्या है |


अध्याय 4 श्लोक 4 - 16 , BG 4 - 16 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 16


कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इसे निश्चित करने में बुद्धिमान् व्यक्ति भी मोहग्रस्त हो जाते हैं | अतएव मैं तुमको बताऊँगा कि कर्म क्या है, जिसे जानकर तुम सारे अशुभ से मुक्त हो सकोगे |


अध्याय 4 श्लोक 4 - 15 , BG 4 - 15 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 15


प्राचीन काल में समस्त मुक्तात्माओं ने मेरी दिव्य प्रकृति को जान करके ही कर्म किया, अतः तुम्हें चाहिए कि उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करो |


अध्याय 4 श्लोक 4 - 14 , BG 4 - 14 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 14

मुझ पर किसी कर्म का प्रभाव नहीं पड़ता, न ही मैं कर्मफल की कामना करता हूँ | जो मेरे सम्बन्ध में इस सत्य को जानता है, वह कभी भी कर्मों के पाश में नहीं बँधता |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 13 , BG 4 - 13 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 13

प्रकृति के तीनों गुणों और उनसे सम्बद्ध कर्म के अनुसार मेरे द्वारा मानव समाज के चार विभाग रचे गये | यद्यपि मैं इस व्यवस्था का स्त्रष्टा हूँ, किन्तु तुम यह जाना लो कि मैं इतने पर भी अव्यय अकर्ता हूँ | 

अध्याय 4 श्लोक 4 - 12 , BG 4 - 12 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 12

इस संसार में मनुष्य सकाम कर्मों में सिद्धि चाहते हैं, फलस्वरूप वे देवताओं की पूजा करते हैं | निस्सन्देह इस संसार में मनुष्यों को सकाम कर्म का फल शीघ्र प्राप्त होता है |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 11 , BG 4 - 11 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 11

जिस भाव से सारे लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, उसी के अनुरूप मैं उन्हें फल देता हूँ | हे पार्थ! प्रत्येक व्यक्ति सभी प्रकार से मेरे पथ का अनुगमन करता है |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 10 , BG 4 - 10 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 10

आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतया तन्मय होकर और मेरी शरण में आकर बहुत से व्यक्ति भूत काल में मेरे ज्ञान से पवित्र हो चुके हैं | इस प्रकार से उन सबों ने मेरे प्रति दिव्यप्रेम को प्राप्त किया है |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 9 , BG 4 - 9 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 9

हे अर्जुन! जो मेरे अविर्भाव तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह इस शरीर को छोड़ने पर इस भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 8 , BG 4 - 8 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 8

भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 7 , BG 4 - 7 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 7

हे भारतवंशी! जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 6 , BG 4 - 6 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 6

यद्यपि मैं अजन्मा तथा अविनाशी हूँ और यद्यपि मैं समस्त जीवों का स्वामी हूँ, तो भी प्रत्येक युग में मैं अपने आदि दिव्य रूप में प्रकट होता हूँ |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 5 , BG 4 - 5 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 5

श्रीभगवान् ने कहा – तुम्हारे तथा मेरे अनेकानेक जन्म हो चुके हैं | मुझे तो उन सबका स्मरण है, किन्तु हे परंतप! तुम्हें उनका स्मरण नहीं रह सकता है |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 4 , BG 4 - 4 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 4

अर्जुन ने कहा – सूर्यदेव विवस्वान् आप से पहले हो चुके (ज्येष्ठ) हैं, तो फिर मैं कैसे समझूँ कि प्रारम्भ में भी आपने उन्हें इस विद्या का उपदेश दिया था |

अध्याय 4 श्लोक 4 - 3 , BG 4 - 3 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 3

आज मेरे द्वारा वही यह प्राचीन योग यानी परमेश्र्वर के साथ अपने सम्बन्ध का विज्ञान, तुमसे कहा जा रहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त तथा मित्र हो, अतः तुम इस विज्ञान के दिव्य रहस्य को समझ सकते हो |


अध्याय 4 श्लोक 4 - 2 , BG 4 - 2 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 2

इस प्रकार यह परम विज्ञान गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त किया गया और राजर्षियों ने इसी विधि से इसे समझा | किन्तु कालक्रम में यह परम्परा छिन्न हो गई, अतः यह विज्ञान यथारूप में लुप्त हो गया लगता है |


अध्याय 4 श्लोक 4 - 1 , BG 4 - 1 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 4 श्लोक 1
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा – मैंने इस अमर योगविद्या का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान् को दिया और विवस्वान् ने मनुष्यों के पिता मनु को उपदेश दिया और मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया |

अध्याय 3 श्लोक 3 - 43 , BG 3 - 43 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 43
इस प्रकार हे महाबाहु अर्जुन! अपने आपको भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जान कर और मन को सावधान आध्यात्मिक बुद्धि (कृष्णभावनामृत) से स्थिर करके आध्यात्मिक शक्ति द्वारा इस काम-रूपी दुर्जेय शत्रु को जीतो |
 
 

अध्याय 3 श्लोक 3 - 42 , BG 3 - 42 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 42

कर्मेन्द्रियाँ जड़ पदार्थ की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, मन इन्द्रियों से बढ़कर है, बुद्धि मन से भी उच्च है और वह (आत्मा) बुद्धि से भी बढ़कर है ।

 

अध्याय 3 श्लोक 3 - 41 , BG 3 - 41 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 41

इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! प्रारम्भ में ही इन्द्रियों को वश में करके इस पाप का महान प्रतीक (काम) का दमन करो और ज्ञान तथा आत्म-साक्षात्कार के इस विनाशकर्ता का वध करो ।

 

अध्याय 3 श्लोक 3 - 40 , BG 3 - 40 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 40

इन्द्रियाँ, मन तथा बुद्धि इस काम के निवासस्थान हैं | इनके द्वारा यह काम जीवात्मा के वास्तविक ज्ञान को ढक कर उसे मोहित कर लेता है |

 

अध्याय 3 श्लोक 3 - 39 , BG 3 - 39 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 39

इस प्रकार ज्ञानमय जीवात्मा की शुद्ध चेतना उसके काम रूपी नित्य शत्रु से ढकी रहती है जो कभी भी तुष्ट नहीं होता और अग्नि के समान जलता रहता है |

 

अध्याय 3 श्लोक 3 - 38 , BG 3 - 38 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 38

जिस प्रकार अग्नि धुएँ से, दर्पण धूल से अथवा भ्रूण गर्भाशय से आवृत रहता है, उसी प्रकार जीवात्मा इस काम की विभिन्न मात्राओं से आवृत रहता है ।

 

अध्याय 3 श्लोक 3 - 37 , BG 3 - 37 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 37

श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन! इसका कारण रजोगुण के सम्पर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है |

 

अध्याय 3 श्लोक 3 - 36 , BG 3 - 36 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 36

अर्जुन ने कहा – हे वृष्णिवंशी! मनुष्य न चाहते हुए भी पापकर्मों के लिए प्रेरित क्यों होता है? ऐसा लगता है कि उसे बलपूर्वक उनमें लगाया जा रहा हो |
 

अध्याय 3 श्लोक 3 - 35 , BG 3 - 35 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 3 श्लोक 35

अपने नियतकर्मों को दोषपूर्ण ढंग से सम्पन्न करना भी अन्य के कर्मों को भलीभाँति करने से श्रेयस्कर है | स्वीय कर्मों को करते हुए मरना पराये कर्मों में प्रवृत्त होने की अपेक्षा श्रेष्ठतर है, क्योंकि अन्य किसी के मार्ग का अनुसरण भयावह होता है |