किन्तु जो
अज्ञानी तथा श्रद्धाविहीन व्यक्ति शास्त्रों में संदेह करते हैं, वे
भगवद्भावनामृत नहीं प्राप्त करते, अपितु नीचे गिर जाते है | संशयात्मा के
लिए न तो इस लोक में, न ही परलोक में कोई सुख है |
जो श्रद्धालु
दिव्यज्ञान में समर्पित है और जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह
इस ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है और इसे प्राप्त करते ही वह तुरन्त
आध्यात्मिक शान्ति को प्राप्त होता है |
इस संसार में
दिव्यज्ञान के सामान कुछ भी उदात्त तथा शुद्ध नहीं है | ऐसा ज्ञान समस्त
योग का परिपक्व फल है | जो व्यक्ति भक्ति में सिद्ध हो जाता है, वह यथासमय
अपने अन्तर में इस ज्ञान का आस्वादन करता है |
स्वरुपसिद्ध
व्यक्ति से वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर चुकने पर तुम पुनः कभी ऐसे मोह को
प्राप्त नहीं होगे क्योंकि इस ज्ञान के द्वारा तुम देख सकोगे कि सभी जीव
परमात्मा के अंशस्वरूप हैं, अर्थात् वे सब मेरे हैं |
तुम गुरु के
पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो | उनसे विनीत होकर जिज्ञासा करो और
उनकी सेवा करो | स्वरुपसिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकते हैं,
क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है |
ये सभी यज्ञ
करने वाले यज्ञों का अर्थ जानने के कारण पापकर्मों से मुक्त हो जाते हैं और
यज्ञों के फल रूपी अमृत को चखकर परम दिव्य आकाश की ओर बढ़ते जाते हैं |
अन्य लोग भी
हैं जो समाधि में रहने के लिए श्र्वास को रोके रहते हैं (प्राणायाम) | वे
अपान में प्राण को और प्राण में अपान को रोकने का अभ्यास करते हैं और अन्त
में प्राण-अपान को रोककर समाधि में रहते हैं | अन्य योगी कम भोजन करके
प्राण की प्राण में ही आहुति देते हैं |
कठोर व्रत
अंगीकार करके कुछ लोग अपनी सम्पत्ति का त्याग करके, कुछ कठिन तपस्या
द्वारा, कुछ अष्टांग योगपद्धति के अभ्यास द्वारा अथवा दिव्यज्ञान में
उन्नति करने के लिए वेदों के अध्ययन द्वारा प्रबुद्ध बनते हैं |
दूसरे, जो मन
तथा इन्द्रियों को वश में करके आत्म-साक्षात्कार करना चाहते हैं, सम्पूर्ण
इन्द्रियों तथा प्राणवायु के कार्यों को संयमित मन रूपी अग्नि में आहुति कर
देते हैं |
इनमें से कुछ
(विशुद्ध ब्रह्मचारी) श्रवणादि क्रियाओं तथा इन्द्रियों को मन की नियन्त्रण
रूपी अग्नि में स्वाहा कर देते हैं तो दूसरे लोग (नियमित गृहस्थ)
इन्द्रियविषयों को इन्द्रियों की अग्नि में स्वाहा कर देते हैं |
जो
व्यक्ति कृष्णभावनामृत में पूर्णतया लीन रहता है, उसे अपने आध्यात्मिक
कर्मों के योगदान के कारण अवश्य ही भगवद्धाम की प्राप्ति होती है, क्योंकि
उसमें हवन आध्यात्मिक होता है और हवि भी आध्यात्मिक होती है ।
जो स्वतः होने
वाले लाभ से संतुष्ट रहता है, जो द्वन्द्व से मुक्त है और ईर्ष्या नहीं
करता, जो सफलता तथा असफलता दोनों में स्थिर रहता है, वह कर्म करता हुआ भी
कभी बँधता नहीं |
ऐसा ज्ञानी
पुरुष पूर्णरूप से संयमित मन तथा बुद्धि से कार्य करता है, अपनी सम्पत्ति
के सारे स्वामित्व को त्याग देता है और केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करता
है | इस तरह कार्य करता हुआ वह पाप रूपी फलों से प्रभावित नहीं होता है |
जिस व्यक्ति का
प्रत्येक प्रयास (उद्यम) इन्द्रियतृप्ति की कामना से रहित होता है, उसे
पूर्णज्ञानी समझा जाता है | उसे ही साधु पुरुष ऐसा कर्ता कहते हैं, जिसने
पूर्णज्ञान की अग्नि से कर्मफलों को भस्मसात् कर दिया है |
जो मनुष्य कर्म
में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह सभी मनुष्यों में बुद्धिमान् है
और सब प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त रहकर भी दिव्य स्थिति में रहता है |
कर्म क्या है
और अकर्म क्या है, इसे निश्चित करने में बुद्धिमान् व्यक्ति भी मोहग्रस्त
हो जाते हैं | अतएव मैं तुमको बताऊँगा कि कर्म क्या है, जिसे जानकर तुम
सारे अशुभ से मुक्त हो सकोगे |
प्राचीन काल
में समस्त मुक्तात्माओं ने मेरी दिव्य प्रकृति को जान करके ही कर्म किया,
अतः तुम्हें चाहिए कि उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्य का
पालन करो |
मुझ पर किसी
कर्म का प्रभाव नहीं पड़ता, न ही मैं कर्मफल की कामना करता हूँ | जो मेरे
सम्बन्ध में इस सत्य को जानता है, वह कभी भी कर्मों के पाश में नहीं बँधता |
प्रकृति के
तीनों गुणों और उनसे सम्बद्ध कर्म के अनुसार मेरे द्वारा मानव समाज के चार
विभाग रचे गये | यद्यपि मैं इस व्यवस्था का स्त्रष्टा हूँ, किन्तु तुम यह
जाना लो कि मैं इतने पर भी अव्यय अकर्ता हूँ |
इस संसार में
मनुष्य सकाम कर्मों में सिद्धि चाहते हैं, फलस्वरूप वे देवताओं की पूजा
करते हैं | निस्सन्देह इस संसार में मनुष्यों को सकाम कर्म का फल शीघ्र
प्राप्त होता है |
जिस भाव से
सारे लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, उसी के अनुरूप मैं उन्हें फल देता हूँ |
हे पार्थ! प्रत्येक व्यक्ति सभी प्रकार से मेरे पथ का अनुगमन करता है |
आसक्ति, भय तथा
क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतया तन्मय होकर और मेरी शरण में आकर
बहुत से व्यक्ति भूत काल में मेरे ज्ञान से पवित्र हो चुके हैं | इस प्रकार
से उन सबों ने मेरे प्रति दिव्यप्रेम को प्राप्त किया है |