Translate

Saturday, 4 June 2016

अध्याय 11 श्लोक 11 - 41 , 42 , BG 11 - 41 , 42 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 11 श्लोक 41 - 42

आपको अपना मित्र मानते हुए मैंने हठपूर्वक आपको हे कृष्ण, हे यादव, हेसखा जैसे सम्बोधनों से पुकारा है, क्योंकि मैं आपकी महिमा को नहीं जानता था |मैंने मूर्खतावश या प्रेमवश जो कुछ भी किया है, कृपया उसके लिए मुझे क्षमा कर दें| यही नहीं, मैंने कई बार आराम करते समय, एकसाथ लेटे हुए या साथ-साथ खाते या बैठेहुए, कभी अकेले तो कभी अनेक मित्रों के समक्ष आपका अनादर किया है | हे अच्युत!मेरे इन समस्त अपराधों को क्षमा करें |



अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11.41 - 42




सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति |
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि || ४१ ||

यच्चावहासार्थमसत्कृतोSसि विहारशय्यासनभोजनेषु |
एकोSथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् || ४२ ||







सखा – मित्र; इति – इस प्रकार; मत्वा – मानकर; प्रसभम् – हठपूर्वक; यत्– जो भी; उत्तम् – कहा गया; हे कृष्ण – हे कृष्ण; हे यादव – हे यादव; हे सखा – हेमित्र; इति – इस प्रकार; अजानता – बिना जाने; महिमानम् – महिमा को; तव – आपकी;इदम् – यह; मया – मेरे द्वारा; प्रमादात् – मूर्खतावश; प्रणयेन – प्यार वश; वा अपि– या तो; यत् – जो; – भी; अह्वास-अर्थम् – हँसी के लिए; असत्-कृतः – अनादर कियागया; असि – हो; विहार – आराम में; शय्या – लेटे रहने पर; आसन – बैठे रहने पर;भोजनेषु – या भोजन करते समय; एकः – अकेले; अथवा – या; अपि – भी; अच्युत – हेअच्युत; तत्-समक्षम् – साथियों के बीच; तत् – उन सभी; क्षामये – क्षमाप्रार्थीहूँ; त्वाम् – आपसे; अहम् – मैं; अप्रमेयम् – अचिन्त्य |




भावार्थ


आपको अपना मित्र मानते हुए मैंने हठपूर्वक आपको हे कृष्ण, हे यादव, हेसखा जैसे सम्बोधनों से पुकारा है, क्योंकि मैं आपकी महिमा को नहीं जानता था |मैंने मूर्खतावश या प्रेमवश जो कुछ भी किया है, कृपया उसके लिए मुझे क्षमा कर दें| यही नहीं, मैंने कई बार आराम करते समय, एकसाथ लेटे हुए या साथ-साथ खाते या बैठेहुए, कभी अकेले तो कभी अनेक मित्रों के समक्ष आपका अनादर किया है | हे अच्युत!मेरे इन समस्त अपराधों को क्षमा करें |



तात्पर्य



यद्यपि अर्जुन के समक्ष कृष्ण अपने विराट रूप में हैं,किन्तु उसे कृष्ण के साथ अपना मैत्रीभाव स्मरण है | इसीलिए वह मित्रता के कारणहोने वाले अनेक अपराधों को क्षमा करने के लिए प्रार्थना कर रहा है | वह स्वीकारकरता है कि पहले उसे ज्ञात ण था कि कृष्ण ऐसा विराट रूप धारण कर सकते हैं, यद्यपिमित्र के रूप में कृष्ण ने उसे यह समझाया था | अर्जुन को यह भी पता नहीं था किउसने कितनी बार ‘हे मेरे मित्र’ ‘हे कृष्ण’ ‘हे यादव’ जैसे सम्बोधनों के द्वाराउनका अनादर किया है और उनकी महिमा स्वीकार नहीं की | किन्तु कृष्ण इतने कृपालु हैंकि इतने ऐश्र्वर्यमण्डित होने पर भी अर्जुन से मित्र की भूमिका निभाते रहे | ऐसाहोता है भक्त तथा भगवान् के बीच दिव्य प्रेम का आदान-प्रदान | जीव तथा कृष्ण कासम्बन्ध शाश्र्वत रूप से स्थिर है, इसे भुलाया नहीं जा सकता, जैसा कि हम अर्जुन केआचरण में देखते हैं | यद्यपि अर्जुन विराट रूप का ऐश्र्वर्य देख चुका है, किन्तुवह कृष्ण के साथ अपनी मैत्री नहीं भूल सकता |







1  2  3  4  5  6  7  8  9  10

11  12  13  14  15  16  17  18  19   20

21  22  23  24  25  26  27  28  29  30

31  32  33  34  35  36  37  38  39  40

41  42  43  44  45  46  47  48  49  50

51  52  53  54  55





<< © सर्वाधिकार सुरक्षित भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट >>




Note : All material used here belongs only and only to BBT .
For Spreading The Message Of Bhagavad Gita As It Is 
By Srila Prabhupada in Hindi ,This is an attempt to make it available online , 
if BBT have any objection it will be removed .

No comments:

Post a Comment