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Saturday, 4 June 2016

अध्याय 11 श्लोक 11 - 29 , BG 11 - 29 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 11 श्लोक 29

मैं समस्त लोगों को पूर्ण वेग से आपके मुख में उसी प्रकार प्रविष्टहोते देख रहा हूँ, जिस प्रकार पतिंगे अपने विनाश के लिए प्रज्जवलित अग्नि में कूदपड़ते हैं |



अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .29




यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः |

तथैव नाशाय विशन्ति लोका-स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः || २९ ||




यथा – जिस प्रकार; प्रदीप्तम् – जलती हुई; ज्वलनम् – अग्नि में; पतङगाः – पतिंगे, कीड़े मकोड़े; विशन्ति – प्रवेश करते हैं; नाशाय – विनाश के लिए; समृद्ध – पूर्ण; वेगाः – वेग; तथा एव – उसी प्रकार से; नाशाय – विनाश के लिए; विशन्ति – प्रवेश कर रहे हैं; लोकाः – सारे लोग; एव – आपके; अपि – भी; वक्त्राणि – मुखों में; समृद्ध-वेगाः – पुरे वेग से |

भावार्थ
मैं समस्त लोगों को पूर्ण वेग से आपके मुख में उसी प्रकार प्रविष्टहोते देख रहा हूँ, जिस प्रकार पतिंगे अपने विनाश के लिए प्रज्जवलित अग्नि में कूदपड़ते हैं |




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