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Tuesday, 8 March 2016

अध्याय 11 श्लोक 11 - 20 , BG 11 - 20 Bhagavad Gita As It Is Hindi

 अध्याय 11 श्लोक 20
यद्यपि आप एक हैं, किन्तु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं | हे महापुरुष! आपके इस अद्भुत तथा भयानक रूप को देखके सारे लोक भयभीत हैं |



अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .20



द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि 

व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्र्च सर्वाः | 

दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं 

लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् || २० ||



द्यौ – बाह्य आकाश से लेकर; आ-पृथिव्योः – पृथ्वी तक; इदम् – इस; अन्तरम् – मध्य में; हि – निश्चय ही; व्याप्तम् – व्याप्त; त्वया – आपके द्वारा; एकेन – अकेला; दिशः – दिशाएँ; – तथा; सर्वाः – सभी; दृष्ट्वा – देखकर; अद्भुतम् – अद्भुत; रूपम् – रूप को; उग्रम् – भयानक; तव – आपके; इदम् – इस; लोक – लोक; त्रयम् – तीन; प्रव्यथितम् – भयभीत, विचलित; महा-आत्मन् – हे महापुरुष |



भावार्थ

यद्यपि आप एक हैं, किन्तु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं | हे महापुरुष! आपके इस अद्भुत तथा भयानक रूप को देखके सारे लोक भयभीत हैं |

तात्पर्य



इस श्लोक में द्याव्-आ-पृथिव्योः (धरती तथा आकाश के बीच का स्थान) तथा लोकत्रयम् (तीनों संसार) महत्त्वपूर्ण शब्द हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि न केवल अर्जुन ने इस विश्र्वरूप को देखा, बल्कि अन्य लोकों के वासियों ने भी देखा | अर्जुन द्वारा विश्र्वरूप का दर्शन स्वप्न न था | भगवान् ने जिन जिनको दिव्य दृष्टि प्रदान की, उन्होंने युद्धक्षेत्र में उस विश्र्वरूप को देखा |




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For Spreading The Message Of Bhagavad Gita As It Is 
By Srila Prabhupada in Hindi ,This is an attempt to make it available online , 
if BBT have any objection it will be removed .

12 comments:

  1. Please upload full chapter fast sir, jai sri krishna

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  8. Sir please upload full chapter as your earliest possible, Hare Krishna

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  9. ​श्लोकः11.21

    अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्ति

    केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।

    स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः

    स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।।11.21।।

    भावार्थ
    देवों का सारा समूह आपकी शरण ले रहा है और आपमें प्रवेश कर रहा है । उनमें से कुछ भयभीत होकर हाथ जोङे आपकी प्रार्थना कर रहे हैं। महर्षियों तथा सिद्धों के समूह " कल्याण हो " कहकर वैदिक स्तोत्रो का पाठ करते हुए आपकी स्तुति कर रहे हैं ।
    तात्पर्य
    समस्त लोको के देवता विश्वरूप कि भयानकता तथा प्रदिप्त तेज से इतने भयभीत थे कि वे रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे ।

    श्लोकः११:२२

    रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या

    विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।

    गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा

    वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।।11.22।।

    भावार्थ और तात्पर्य

    शिव के विविध रूप , आदित्यगण, वसु , साध्य, विश्वेदेव , दोनो अश्विनीकुमार , मरूदगण, पितृगंण , गन्धर्व , यक्ष , असुर तथा सिद्धदेव सभी आपको आश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं ।

    श्लोकः११:२३

    रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं

    महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।

    बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं

    दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्।।11.23।।

    भावार्थ और तात्पर्य
    हे महाबाहू ! आपके इस अनेक मुख, नेत्र, बाहू , जंघा , पांव, पेट तथा भयानक दांतों वाले विराट रूप को देखकर देवतागण सहित सभी लोक अत्यंत विचलित हैं और उन्हीं की तरह मैं भी हूँ ।

    श्लोकः११:२४

    नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं

    व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।

    दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा

    धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।11.24।।

    भावार्थ और तात्पर्य

    हे सर्वव्यापी विष्णु ! नाना ज्योतिर्मय रंगों से युक्त आपको आकाश का स्पर्श करते , मुख फैलाये तथा बङी बङी चमकती आंखें निकाले देखकर भय से मेरा मन विचलित है । मै न तो धैर्य धारण कर पा रहा हूँ , न मानसिक संतुलन ही पा रहा हूँ ।

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  10. please upload full chapter with naxt chapter no.12 hare kishna

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  11. please upload fast upto chapter 12

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  12. please upload fast upto chapter 12

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